05.05.21
वैसे तो मेरे शब्द नींद में चीखते रहते हैं जैसे एक ही साथ, हाथ पकड़े कभी भी उतर जाएं किसी कतार में। जहां भी जाएं, साथ–साथ। कभी कल्पनाओं के भरोसे तो कभी यूं हीं, आज़ाद। लेकिन जैसे ही कहीं समेटने बैठो तो सहसा ही गुम हो जाते हैं। पहुंच से बाहर। न ही नज़र आते हैं न ही समझ। ऐसा लगता है वे भांप लेते हैं एक ओर से कि ये इसने फिर एक पन्ना पलटा, कलम उठाई और बस, द्वंद शुरू। शायद उन्हें बिना उनकी इच्छा के कहीं आना जाना नही भाता और मैं उनके कठोर मालिक की तरह उन पर अधिकार जमाए बैठी हूं। मैं जल्दी समझी उनकी व्यथा, उन्हें रोज़ न सताऊं तो वह शायद गुम हो जाए। जैसे मैंने समझा उन्हें, जिस दिन वो समझें तो शायद खुद ही चले आएं और कहें की “आज साथ में कुछ रचते हैं, हम तुम्हारे पन्नों पर उतरते हैं।”
