27.05.21
हर रोज़ नियमानुसार मैं यहां से बाहर देखना पसंद करती हूं। स्थिर/शांत (जो आपको सही लगे, दोनो ही उपयुक्त हैं।)। इस समय आंखों और दिमाग के बीच का सामंजस्य देखकर आप दंग हो सकते हैं। आंखें इस समय चंचल है, दिमाग विचलित।
यह समझिए, आंखें दिमाग को सोचने पर मजबूर कर रहीं हैं और दिमाग आंखों को देखने के लिए।
उस पार एक दुनिया है कुछ ऊपर, बहुत नीचे। इस पार जो अंधेरा आप देख रहें हैं वही शेष है। इनके बीच दूरी केवल एक खिड़की की है। इतनी ही दूरी है, इतना ही सामंजस्य है आंखों और दिमाग के बीच पर गहराई बहुत है। यही गहराई है कुछ ऊपर, बहुत नीचे की इस दुनिया के बीच। इस खिड़की के जो परे है।
