हर रोज़ नियमानुसार मैं यहां से बाहर देखना पसंद करती हूं। स्थिर/शांत (जो आपको सही लगे, दोनो ही उपयुक्त हैं।)। इस समय आंखों और दिमाग के बीच का सामंजस्य देखकर आप दंग हो सकते हैं। आंखें इस समय चंचल है, दिमाग विचलित। यह समझिए, आंखें दिमाग को सोचने पर मजबूर कर रहीं हैं और दिमाग आंखों को देखने के लिए। उस पार एक दुनिया है कुछ ऊपर, बहुत नीचे। इस पार जो अंधेरा आप देख रहें हैं वही शेष है। इनके बीच दूरी केवल एक खिड़की की है। इतनी ही दूरी है, इतना ही सामंजस्य है आंखों और दिमाग के बीच पर गहराई बहुत है। यही गहराई है कुछ ऊपर, बहुत नीचे की इस दुनिया के बीच। इस खिड़की के जो परे है।
तो क्या हुआ अगर मैंने कभी उसे देखा नहीं या मैं उससे मिली नहीं? महत्वपूर्ण यह है कि वो फिर भी मेरी स्मृतियों में एक स्थान निश्चित किए हुए है। वो बूढ़ी हो चुकी है बिल्कुल उस जंग खाए लोहे के पुश्तैनी बक्से की तरह जिसमें मां ने अपनी शादी की साड़ियां– गहनें सहेज रखे हैं। उसने भी सहेज रखा है कुछ अपने भीतर, साड़ियां– गहनें तो नहीं पर आशा और अनुभव। इतने वर्षो में कितना कुछ देख लिया होगा उसने और आज भी निरंतर देख रही है। केवल बदलाव आया है तो इतना सा कि पहले जो देखा वो अनुभव हुआ आज जो देख रही है, सब आशा है। उसके चेहरे पर पड़ी झुर्रियां नक्शे की रेखाओं जैसी लग रही है, दूर से बिखरी हुई नज़दीक से आयोजित। ऐसा लगता है किसी ने उत्साह से, कोई मास्टरपीस बनाने की चाह में रेखाएं खींची और फिर सफल न होने पर उससे ऊब कर अधूरा ही छोड़ दिया। अब वो कला अधूरी पड़ी है और कलाकार बेखबर। अलमारी से रोज शोर मचाती है याद दिलाती है, कलाकार नजरंदाज करता जाता है। दोनो ही एक दूसरे के पर्याय हैं। कभी कलाकार कला बनाता है और कभी कला कलाकार बना देती है। वो तो कला बनी रह गई। उसकी एक तस्वीर है मेरे पास, जैसे ही सोचो सामने आ जाती है। लेकिन तस्वीरें भविष्य तो नहीं दिखाती, दिखाती हैं जो घट चुका हो। यह तो अभी घटा ही नहीं जो घटा ही नहीं वो स्मरणीय कैसे है? वो अभी बूढ़ी हुई कहां है, हो सकती है और होगी ही पर जब होगी तो बिल्कुल उस तस्वीर सी लगेगी। एक स्मृति से भविष्य तक पहुंचेगी।
जिजीविषा : जीने की चाह (will to live)(9.05.21, घर)