LIKE A LIFE IN A METRO

At the Shivaji Stadium Metro Station, while waiting for the metro, I was recalling some random incidents and of course the people who crossed my mind knowingly-unknowingly.

A Few days ago, while roaming around Connaught place, I witnessed too many usual & unusual things. By ‘Usual’ I mean the basics I’ve been neglecting throughout my life. A lady living on a footpath, along with her two burner gas stove & her forlorn husband- battling from illness, lying beside her on a two layered bedsheet, covered from top to bottom in a thin wool multicolored blanket. “Survival isn’t a choice,” indeed. She took out a pan, put it on the gas stove and adjusted herself to make a cup of tea. That, that is a day in her life. Whatever she was doing out of her content was enough for their survival.

I walked past her but she remained still in my core memory like a very unusual thing.

Now that the metro has arrived, the lady left the place. The road is a track now and the lady is the metro.

27 November 2021 (Shivaji Stadium Metro Station)

पाठक, बाजार और रोजगार

13.06.21

दर बदर भटकते से घूमते ज्ञान की तलाश में, ये पुस्तक अनुरागी जिनका जीवन है पुस्तकों के बीच और घर है दरियागंज। यहां नई या पुरानी, बच्चों के लिए या विद्यार्थियों के लिए साहित्य से लेकर मनोरंजन, शिक्षात्मक, खेल संबंधी सभी प्रकार की पठनीय सामग्री पटरियों पर सजी हुई है या दुकानों में अपनी जगह बनाए हुए है। किताबों से रिश्ते जोड़ना ज़रा महंगा पड़ता है। हमारे पसंदीदा पठन – पाठन की नई प्रतियां मानो अपनी ओर खींचती हैं और पाठक उसकी ओर खींचा चला जाता है जिसका जिम्मा पाठक की जेबें उठाती हैं। लेकिन दरियागंज का रविवार पुस्तक बाज़ार आपको विस्मित कर देगा।

1960 के दशक के बाद दरियागंज कुछ पुरानी कुछ नई किताबों का घर बन गया और इस बाजार को इसकी एक नई पहचान मिली। स्थानीय लोगों के अनुसार दरियागंज एक उपभोक्ता सामान बाजार के रूप में शुरू हुआ, जो की सुभाष पार्क और कस्तूरबा गांधी अस्पताल के बीच की दीवारों के पास स्थित हुआ करता था। सभी प्रकार के रिकॉर्ड प्लेयर, रेडियो, ट्रांजिस्टर, मेडिकल सामान के बीच आखिरकार किताबों ने भी अपनी जगह बना ली। हालांकि समय के साथ साथ किताबों की जगहों को कई बार बदला गया लेकिन किताबें दरियागंज की गलियों से कभी बाहर नही हुई। हर जगह पाठक यह पुस्तक बाज़ार खोज ही लेता।

कुछ मामूली पुनर्वास के बाद, पुस्तक बाजार का विस्तार गोलचा सिनेमा से लेकर दिल्ली गेट तक हुआ। परंतु वर्षों तक एक ही जगह निर्धारित समय से चलता ये बाजार 26 जुलाई 2019 को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा बंद कर दिया गया। दरअसल यह फैसला दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की उस रिपोर्ट के बाद दिया गया, जिसमें कहा गया था कि पटरी पर लगने वाले इस मार्केट से ट्रैफिक संबंधी कई तरह की दिक्कतों से लोगों को जूझना पड़ रहा है। ऐसा लगा सभी पाठकों से उनका हक छीन गया हो। इसका असर केवल पाठकों ने नहीं बल्कि उन तमाम पुस्तक विक्रेताओं को भी झेलना पड़ा जिनके जीवन का चक्र इस बाजार पर टिका हुआ था। इस बाजार के बंद होने से लगभग 272 पुस्तक विक्रेताओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। इनमें से कई पुस्तक विक्रेता कई पीढ़ियों से इसी पटरी पर बैठकर अपनी रोजी-रोटी चला रहे थे।

सुभाष चंद अग्रवाल नाम के किताब विक्रेता का कहना है कि, “कोर्ट के इस आदेश से हम टूट गए हैं। मैं 72 साल का हूं। दिल का दौरा पड़ने से मेरे बेटे की मौत हो गई। मेरा पोता 19 साल का है। पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई है। इस उम्र में मैं किस तरह से अपने परिवार का पेट पाल पाऊंगा। कोर्ट को बाजार बंद करने से पहले हमारी तकलीफों के बारे में सोचना चाहिए था।”

वहीं दूसरी ओर अपनी पसंदीदा पुस्तकों को खोजने पहुंची रश्मि बनारस की रहने वाली हैं जो बताती हैं कि बचपन में उनके पिताजी उन्हें यहां लाया करते थे और अपने कॉलेज के दिनों में भी वह यहीं से अपनी शिक्षात्मक एवं उनकी रुचि की किताबें खरीदा करती थीं। परंतु आज इस बाजार को मौन देख कर उनके बचपन को आहत पहुंचा है। उनका कहना है कि “मैं पुस्तकों के बीच ही पली बढ़ी, हर तरह के साहित्य में मेरी रुचि बनी और जब इस बाजार में आती थी तो समझ नहीं पाती थी क्या खरीदूं कितना खरीदूं सभी कुछ अपना लगता था और यही अनुभव मैं अपनी बेटी को भी कराना चाहती थी। लेकिन इस पुस्तक बाज़ार का बंद होना मेरे उन सभी स्वप्नों का बिखर जाना है।”

इसके अतिरिक्त कितने ही विद्यार्थी अपनी स्कूल, कॉलेज के लिए पठनीय सामग्री ढूंढने के लिए दरियागंज का ही रास्ता देखते थे लेकिन बाजार बंद हो जाने से सामग्री को ढूंढ पाना उनके लिए कठिन हो गया है। पहले जहां अभी किताबों का एक ठिकाना था अब वही किताबें उन्हें लाइब्रेरी, बुक स्टॉल या जगह जगह की दुकानों में ढूंढनी पड़ती है।

पुस्तक विक्रेताओं के प्रदर्शन के पश्चात एवं पाठकों की उत्सुकता और परेशानियों को देखते हुए आखिरकार रविवार पुस्तक बाज़ार को एक नया घर मिला। इस बाजार को चांदनी चौक में ब्रॉडवे होटल के सामने महिला हाट में जगह दी गई।

हालांकि जगह मिल जाने के बाद चाहे बाजार को पुनः जीवन मिला परंतु आए दिन इसे नई परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है। पिछले कुछ हफ्तों से यह बाजार वैश्विक महामारी के चलते बंद रहा और अब भी अनियमित रूप से इसे चलाया जाता है।

रविवार पुस्तक बाज़ार पटरी वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष कमर सईद बताते हैं कि “पिछले कई दिनों से बाजार अनियमित रूप से खोला जाता है। इतना ही नही केवल एक दिन के लिए ही हमें अनुमति दी जाती है और वो भी केवल सुबह 9 बजे से लेकर शाम को 5 बजे तक। कई बार बाजार 3 बजे खोला जाता है और 7 बजे तक बंद कर दिया जाता है। ऐसे में जितने लोग सुबह किताबें खरीदने आते हैं वह बाजार बंद समझ कर उल्टे पाँव लौट जाते हैं।”

दरियागंज

CONCILIATION🎐

I’m having a little pain and difficulty writing this as I cut my finger 2 days back, but the good thing is it’s healing. What else does one want? People desire to heal as soon as they get hurt. This year (not even in a year, nearly a week or two) we’ve lost so many people, mostly due to covid. Like 6-7 in a row. The first dead person I witnessed was my Nani. 10 months ago. I remember everything I saw that day. I still recall it (who, how and when the news was broken, how we went there, all of the emotions and of course ‘her’) I don’t remember any faces I saw that day but just, hers. I wasn’t allowed to see her, so they sent me upstairs but I knew this was my last chance to look at her. So I managed to find a place to have a glimpse of her. I took more than a glimpse. It felt like my eyes would never have enough of her. She was still, lifeless but somehow talking. She was waiting for her death for a very long time. Maybe she’d already figured out what life is all about. I looked at her till she went. She’s not here anymore. I realised, to leave is a better or the best choice one can ever make for themselves or even for the one they cared/loved their entire life (why didn’t I entirely use the word love here has a different story.) I’ve started to wake up early in the morning to see sunrise, to listen to birds chirping, to see life happening around me in its little, purest form. I think it is because one never knows when it’ll be your last.

Years back (To the childhood)

कोरोना का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 😷

मनुष्य को बांधना उतना ही असंभव है जितना बहते पानी को रोकना। परंतु 2019 में फैली इस कोरोना ( कोविड–19) नामक महामारी ने समस्त विश्व को झकझोर कर रख दिया। सड़कों की चहल पहल को सन्नाटे में तब्दील कर दिया, सामाजिक स्थानों को अकेला कर दिया और लोगों को चारदीवारी में बंद कर दिया। विश्व के कोने कोने में इस महामारी ने अपने पंजे गढ़ा कर अधिकाधिक संख्या में लोगों को अपनी चपेट में लिया। विश्व को इस महामारी से बचाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्वव्यापी तालाबंदी (लॉकडाउन) लगाने का निर्णय लिया गया। जिससे कम से कम लोग अपने घरों से बाहर निकलें और महामारी की चपेट में आने से बचे रहें। लेकिन कोविड –19 न केवल एक वैश्विक महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनकर उभरी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं वित्तीय बाजार पर भी इसका गंभीर असर पड़ा। आय में अत्यधिक कमी, बेरोजगारी में वृद्धि, परिवहन, सेवा तथा विनिर्माण उद्योगों का ठप्प पड़ना सभी आर्थिक संकट के मुख्य कारण रहे।

कोरोना और अर्थव्यवस्था

इस महामारी ने विश्व-भर में मानव जीवन को काफी नुकसान पहुंचाया है तथा जन-स्वास्थ्य, खाद्य प्रणालियों और कार्य जगत के समक्ष अभूतपूर्व चुनौती प्रस्तुत की है। इस महामारी से उत्पन्न आर्थिक व सामाजिक व्यवधान को विनाशकारी बताया गया है। लाखों लोगों में अत्याधिक गरीबी पड़ने का खतरा बढ़ा है, जबकि वर्तमान में करीब 690 मिलियन अल्प पोषित लोगों की संख्या 132 मिलियन तक बढ़ चुकी है।

लोगों की आजीविका, उनके स्वास्थ्य और हमारे भोजन प्रणालियों पर कोविड का असर :

लाखों उद्यमों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। दुनिया के लगभग आधे (3.3 अरब) वैश्विक कार्यबल उनकी आजीविका खो चुके थे या खोने की कगार पर थे। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कार्यकर्ता विशेष रूप से असुरक्षित होते हैं क्योंकि बहुसंख्य लोगों में सामाजिक सुरक्षा तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल की कमी होती है तथा वे उत्पादक आस्तियों तक पहुंच नहीं पाते। तालाबंदी के दिनों में आय अर्जित किये बिना कई लोग स्वयं को तथा उनके परिवारों को खिलाने में असमर्थ रहे। अधिकांश के लिए, कोई आय न होने का अर्थ है कोई भोजन न होना या कम भोजन और कम पौष्टिक भोजन।

महामारी ने संपूर्ण भोजन प्रणाली को प्रभावित किया है। सीमा बंद होना, व्यापार प्रतिबंध और प्रतिबंध के उपाय किसानों को बाजारों में प्रवेश करने से रोकते रहे हैं। सुरक्षित तथा विविध आहार सामग्री तक पहुंच को कम किया गया है। महामारी ने नौकरियों को कम कर दिया है और लाखों आजीविका खतरे में हैं। रोटी कमाने वाले, बीमार पड़ने और मरने के बाद, लाखों महिलाओं और पुरुषों की खाद्य सुरक्षा और पोषण खतरे में है, कम आय वाले देशों, विशेष रूप से सबसे कम आबादी वाले देश प्रभावित हुए हैं।

स्वास्थ्य सुविधाओं का आर्थिक असर

स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारी बोझ के साथ-साथ प्रभावित देशों के लिए आर्थिक संकट भी प्रमुख रहे हैं। इस महामारी ने समयपूर्व मृत्यु, कार्यस्थल अनुपस्थिति तथा उत्पादकता में कमी के कारण आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला है तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला अवरोध तथा कारखानों के बंद होने के कारण उत्पादक गतिविधि के विनिर्माण से एक नकारात्मक आपूर्ति आघात पैदा कर दिया है। उदाहरण के लिए, चीन में उत्पादन सूचकांक में पिछले महीने के मान (7) से 54% से अधिक की कमी हुई। उत्पादक आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव के अलावा, मुख्यतः आय और घरेलू वित्त में कमी के कारण, उपभोक्ताओं ने अपने खर्च के व्यवहार को बदल दिया, साथ ही महामारी के साथ होने वाले डर और आतंक को भी।

उल्लेखनीय स्वास्थ्य असमानता के अलावा, विशेषकर सभी देशों में, जहां सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है, इस कोविड-19 का आर्थिक प्रभाव देश के आय वितरण में विषम रहा। उदाहरण के लिए, कार्यालयक कामगार प्रतिबंधों के दौरान कार्यचालन की लचीले व्यवस्थारओं में परिवर्तित होने की संभावना अधिक है जबकि बहुत से औद्योगिक, पर्यटन, खुदरा तथा परिवहन कर्मचारियों को समुदाय प्रतिबंधों के कारण तथा अपने सामान और सेवाओं की कम मांग के कारण अपने कार्य में काफी कमी उठानी पड़ेगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़े

भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने के लिए आज तक जो भी आंकड़े पेश किए गए हैं एक बड़ी समस्या है। भारत का बाजार दो क्षेत्रों में बंटा हुआ है :– संगठित क्षेत्र, असंगठित क्षेत्र।

संगठित क्षेत्र जिसमे कुशल मज़दूर होते हैं और उद्योग इनके आंकड़ों संकलित करते है। पर भारत की अर्थव्यवस्था में इन मजदूरों की संख्या काफी कम है। भारत का एक बड़ा तबका असंगठित क्षेत्र में कार्य करता है। इनका कोई सुनिश्चित आंकड़ा सरकार या किसी अन्य संस्थान के पास नहीं है। ऐसे में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को जोड़ा जाता है तब यह क्षेत्र छूट जाता है। 

इसका प्रभाव हम हमेशा से देखते आ रहे हैं परंतु कोविड महामारी के दौरान यह साफ तौर पर सामने आया है। लाखों की संख्या में असंगठित क्षेत्र के मज़दूर सड़कों पर आ गए। सरकार की 20 लाख करोड़ की राहत राशि इन मजदूरों के लिए कुछ खास प्रभावकारी साबित नही हुई। नीति निर्माण के दौरान इन मज़दूरों का अस्तित्व मौन रहा जिस कारण ये महामारी के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुए।

अर्थशास्त्रियों का मत

महामारी से बचाव के लिए दुनियाभर के विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने कई तरीके सुझाएं हैं। इनमे से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

  1. लॉकडाउन के दौरान किसी देश की अर्थव्यवस्था को जो हानि हुई उसकी भरपाई देश के बाज़ार ( अंतराष्ट्रीय/ विश्व बैंक) से कर्ज लेकर करें। भले ही यह देश के बजट में एक बड़ा नुकसान दिखाता है पर लंबे समय के लिए यही तरीका फायदेमंद है।
  2. राहत पैकेज का एक बड़ा हिस्सा देशवासियों के हाथ में सीधे पैसे लाने के लिए खर्च होना चाहिए। इससे जनता खर्च कर पाएगी और मांग भी बढ़ेगी।
  3. राहत पैकेज का एक प्रमुख हिस्सा महामारी से लड़ने और जनता को मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए होना चाहिए।
  4. लंबे समय के लिए निर्माण क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना होगा जिससे नौकरियां बाजार में वापस आएंगी।

यह सुझाव हमने ndtv, 24×7 के पैंडेमिक टाउनहॉल में आए अर्थशास्त्रियों की बातों का अध्ययन करके लिया है। इन अर्थशास्त्रियों में रघुराम राजन, अभिजीत बैनर्जी, सतीश कौशिक, माइकल क्रेमर, अमर्त्य सेन शामिल हैं।

इन सभी उपायों को अपनाकर एक देश महामारी से V–शेप रिकवरी कर सकता है। पर इस रिकवरी को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए सरकार को सक्रिय रूप से अर्व्यवस्था में सुधार के तरीके अपनाने होंगे।