मनुष्य को बांधना उतना ही असंभव है जितना बहते पानी को रोकना। परंतु 2019 में फैली इस कोरोना ( कोविड–19) नामक महामारी ने समस्त विश्व को झकझोर कर रख दिया। सड़कों की चहल पहल को सन्नाटे में तब्दील कर दिया, सामाजिक स्थानों को अकेला कर दिया और लोगों को चारदीवारी में बंद कर दिया। विश्व के कोने कोने में इस महामारी ने अपने पंजे गढ़ा कर अधिकाधिक संख्या में लोगों को अपनी चपेट में लिया। विश्व को इस महामारी से बचाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्वव्यापी तालाबंदी (लॉकडाउन) लगाने का निर्णय लिया गया। जिससे कम से कम लोग अपने घरों से बाहर निकलें और महामारी की चपेट में आने से बचे रहें। लेकिन कोविड –19 न केवल एक वैश्विक महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनकर उभरी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एवं वित्तीय बाजार पर भी इसका गंभीर असर पड़ा। आय में अत्यधिक कमी, बेरोजगारी में वृद्धि, परिवहन, सेवा तथा विनिर्माण उद्योगों का ठप्प पड़ना सभी आर्थिक संकट के मुख्य कारण रहे।
कोरोना और अर्थव्यवस्था
इस महामारी ने विश्व-भर में मानव जीवन को काफी नुकसान पहुंचाया है तथा जन-स्वास्थ्य, खाद्य प्रणालियों और कार्य जगत के समक्ष अभूतपूर्व चुनौती प्रस्तुत की है। इस महामारी से उत्पन्न आर्थिक व सामाजिक व्यवधान को विनाशकारी बताया गया है। लाखों लोगों में अत्याधिक गरीबी पड़ने का खतरा बढ़ा है, जबकि वर्तमान में करीब 690 मिलियन अल्प पोषित लोगों की संख्या 132 मिलियन तक बढ़ चुकी है।
लोगों की आजीविका, उनके स्वास्थ्य और हमारे भोजन प्रणालियों पर कोविड का असर :
लाखों उद्यमों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। दुनिया के लगभग आधे (3.3 अरब) वैश्विक कार्यबल उनकी आजीविका खो चुके थे या खोने की कगार पर थे। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कार्यकर्ता विशेष रूप से असुरक्षित होते हैं क्योंकि बहुसंख्य लोगों में सामाजिक सुरक्षा तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल की कमी होती है तथा वे उत्पादक आस्तियों तक पहुंच नहीं पाते। तालाबंदी के दिनों में आय अर्जित किये बिना कई लोग स्वयं को तथा उनके परिवारों को खिलाने में असमर्थ रहे। अधिकांश के लिए, कोई आय न होने का अर्थ है कोई भोजन न होना या कम भोजन और कम पौष्टिक भोजन।
महामारी ने संपूर्ण भोजन प्रणाली को प्रभावित किया है। सीमा बंद होना, व्यापार प्रतिबंध और प्रतिबंध के उपाय किसानों को बाजारों में प्रवेश करने से रोकते रहे हैं। सुरक्षित तथा विविध आहार सामग्री तक पहुंच को कम किया गया है। महामारी ने नौकरियों को कम कर दिया है और लाखों आजीविका खतरे में हैं। रोटी कमाने वाले, बीमार पड़ने और मरने के बाद, लाखों महिलाओं और पुरुषों की खाद्य सुरक्षा और पोषण खतरे में है, कम आय वाले देशों, विशेष रूप से सबसे कम आबादी वाले देश प्रभावित हुए हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं का आर्थिक असर
स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारी बोझ के साथ-साथ प्रभावित देशों के लिए आर्थिक संकट भी प्रमुख रहे हैं। इस महामारी ने समयपूर्व मृत्यु, कार्यस्थल अनुपस्थिति तथा उत्पादकता में कमी के कारण आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला है तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला अवरोध तथा कारखानों के बंद होने के कारण उत्पादक गतिविधि के विनिर्माण से एक नकारात्मक आपूर्ति आघात पैदा कर दिया है। उदाहरण के लिए, चीन में उत्पादन सूचकांक में पिछले महीने के मान (7) से 54% से अधिक की कमी हुई। उत्पादक आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव के अलावा, मुख्यतः आय और घरेलू वित्त में कमी के कारण, उपभोक्ताओं ने अपने खर्च के व्यवहार को बदल दिया, साथ ही महामारी के साथ होने वाले डर और आतंक को भी।
उल्लेखनीय स्वास्थ्य असमानता के अलावा, विशेषकर सभी देशों में, जहां सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है, इस कोविड-19 का आर्थिक प्रभाव देश के आय वितरण में विषम रहा। उदाहरण के लिए, कार्यालयक कामगार प्रतिबंधों के दौरान कार्यचालन की लचीले व्यवस्थारओं में परिवर्तित होने की संभावना अधिक है जबकि बहुत से औद्योगिक, पर्यटन, खुदरा तथा परिवहन कर्मचारियों को समुदाय प्रतिबंधों के कारण तथा अपने सामान और सेवाओं की कम मांग के कारण अपने कार्य में काफी कमी उठानी पड़ेगी।
भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़े
भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने के लिए आज तक जो भी आंकड़े पेश किए गए हैं एक बड़ी समस्या है। भारत का बाजार दो क्षेत्रों में बंटा हुआ है :– संगठित क्षेत्र, असंगठित क्षेत्र।
संगठित क्षेत्र जिसमे कुशल मज़दूर होते हैं और उद्योग इनके आंकड़ों संकलित करते है। पर भारत की अर्थव्यवस्था में इन मजदूरों की संख्या काफी कम है। भारत का एक बड़ा तबका असंगठित क्षेत्र में कार्य करता है। इनका कोई सुनिश्चित आंकड़ा सरकार या किसी अन्य संस्थान के पास नहीं है। ऐसे में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को जोड़ा जाता है तब यह क्षेत्र छूट जाता है।
इसका प्रभाव हम हमेशा से देखते आ रहे हैं परंतु कोविड महामारी के दौरान यह साफ तौर पर सामने आया है। लाखों की संख्या में असंगठित क्षेत्र के मज़दूर सड़कों पर आ गए। सरकार की 20 लाख करोड़ की राहत राशि इन मजदूरों के लिए कुछ खास प्रभावकारी साबित नही हुई। नीति निर्माण के दौरान इन मज़दूरों का अस्तित्व मौन रहा जिस कारण ये महामारी के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुए।
अर्थशास्त्रियों का मत
महामारी से बचाव के लिए दुनियाभर के विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने कई तरीके सुझाएं हैं। इनमे से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :
- लॉकडाउन के दौरान किसी देश की अर्थव्यवस्था को जो हानि हुई उसकी भरपाई देश के बाज़ार ( अंतराष्ट्रीय/ विश्व बैंक) से कर्ज लेकर करें। भले ही यह देश के बजट में एक बड़ा नुकसान दिखाता है पर लंबे समय के लिए यही तरीका फायदेमंद है।
- राहत पैकेज का एक बड़ा हिस्सा देशवासियों के हाथ में सीधे पैसे लाने के लिए खर्च होना चाहिए। इससे जनता खर्च कर पाएगी और मांग भी बढ़ेगी।
- राहत पैकेज का एक प्रमुख हिस्सा महामारी से लड़ने और जनता को मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए होना चाहिए।
- लंबे समय के लिए निर्माण क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना होगा जिससे नौकरियां बाजार में वापस आएंगी।
यह सुझाव हमने ndtv, 24×7 के पैंडेमिक टाउनहॉल में आए अर्थशास्त्रियों की बातों का अध्ययन करके लिया है। इन अर्थशास्त्रियों में रघुराम राजन, अभिजीत बैनर्जी, सतीश कौशिक, माइकल क्रेमर, अमर्त्य सेन शामिल हैं।
इन सभी उपायों को अपनाकर एक देश महामारी से V–शेप रिकवरी कर सकता है। पर इस रिकवरी को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए सरकार को सक्रिय रूप से अर्व्यवस्था में सुधार के तरीके अपनाने होंगे।